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पहचान

पहचान

पहचान

 

पहचान जो एक नारी को अब तक न मिली,
पैदा हुई तो कहा गया, शर्मा जी के घर बेटी हुई,
शर्मा जी ही क्यों, आशा  क्यों नही?
इसी पहचान को खोते हुए आशा थी पली-बडी,
बचपन से शादी तक शर्मा जी की बेटी कहलायी,
सोचा पढ़-लिख कर अपना नाम कमायेंगी,
तो इस अरमान पर पानी फेरते हुए शादी हुई,
बस तभी से श्रीमती शर्मा हो गई,
क्यों रखा था उसका नाम आशा?
जब किसी की पत्नी  या बेटी ही कहलाना था,
क्या यही सब था जो उसके नसीब में आना था?
विद्रोह करना चाहती थी, पर चुप रही,
क्योंकि कोई साथ न देने वाला था।
क्या चाहा था उसने कुछ इतना कीमती,
जो मुश्किल पाना था?

द्वारा:- सौरव अग्रवाल

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