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नारी- एक अस्तित्व…

नारी- एक अस्तित्व…

चलो आप सब को एक कहानी सुनाते हैं,
एक जीवंत सत्य से अवगत कराते हैं।
कड़वा तो है पर बड़ा अटल सत्य है,
चलो सब मिलकर उस पर से पर्दा हटाते हैं।

एक नाजुक सी कली फूलों का संसार बनाती है,
एक छोटी सी चिड़िया अपना वंस बढ़ाती है,
एक नन्ही सी मछली जल की रानी बन जाती है,
फिर क्यों इस कहानी में अकेली लड़की सवालो से घिर जाती है ।

जन्म देती है तो वो माँ कहलाती है,
पालती पोषती है तो यशोदा माता बन जाती है,
आँचल में रखती है तो मरयम कहलाती है,
फिर क्यों पैदा होने पर सिर्फ लड़की बन जाती है।

प्यार देती है तो प्रेमिका कहलाती है,
प्रेम से बांधती है तो पत्नी बन जाती है,
जीवन भर साथ निभाती है तो जीवनसाथी कहलाती है,
फिर क्यों दयूत सभा में वो सिर्फ एक स्त्री नजर आती है।

राखी बांधती है तो बहन कहलाती है,
हर सुख दुख में साथ देती है तो सखी बन जाती है,
खुशियां बांटती है तो घर की इज़्ज़त बन जाती है,
फिर क्यों किसी की बुरी नज़र की सज़ा वो अकेले पाती है।

दुष्टों का संहार करती है तो काली माता कहलाती है,
भक्तों की रक्षा करती है तो दुर्गा बन जाती है,
अन-धन देती है तो अनापूर्णा कहलती है,
फिर क्यों अपनी रक्षा के लिए द्रौपदी बन जाती है।

दुश्मन भी जिसे याद करे वो रानी लक्ष्मीबाई कहलाती है,
दुसरो के सेवा करे जो वो मदर टेरेसा बन जाती है,
चाँद को भी जीत ले जो वो कल्पना चावला कहलाती है,
फिर क्यों आज भी एक लड़की निर्भया बन जाती है।

अपने रक्त से सींच कर जिसे वो घर का चिराग बनाती है,
जिसके लिए अपनी दुनिया छोड़कर उसका घर-संसार बसाती है,
नन्हे से हाथों से जिसके उंगली पकड़ वो अपने कदम बढ़ाती है,
फिर क्यों हर बार “औरत ही तो है” कहकर रौंद दी जाती है।

शब्द नही है अब आगे कहपाने को,
अधूरे रह गए है पन्नें किताब लिख जाने को,
क्या लिखूं? क्या बताऊँ? क्या बनाऊ इतिहास में?
बस शरीर बन कर रह गई है औरतें बाजार में बिक जाने को
लो खत्म हो गई स्याही मेरी कहकर औरत की ज़बानी को।

By:- Priyanka Bahuguna
B.Ed. (2015-2017) 4th sem
Uttaranchal College of Education (UCE)

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