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हम हार क्यूँ मान लेते हैं !!

हम हार क्यूँ मान लेते हैं !!

हम हार क्यूँ मान लेते हैं !!

एक आदमी कहीं से गुजर रहा था तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा और अचानक रुक गया। उसने देखा कि हाथियों के आगे के पैर में एक रस्सी बंधी हुई है वो सोच में पड़ गया कि हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं।

इस रस्सी को वो जब चाहे तोड़कर भाग सकते हैं लेकिन वो कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। ऐसी कौन सी ताकत है जिसने इन हाथियों को रोक रखा है। उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी इतनी शांति से क्यों खड़े हैं और भागने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे हैं ?

तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है उस समय इनके पास इतनी ताकत नहीं होती कि इस बंधन को तोड़ सकें। बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते।”

“यकीन” जिसे हम विश्वास कहते हैं, बचपन से ही हमें ये यकीन दिलवा दिया जाता है कि हम बंधे हुए हैं,हमारी सीमा तय हैं और हम उससे आगे नहीं जा सकते क्यूंकि बचपन में हमारे अन्दर जोश ज्यादा और ताकत कम होती है इसलिए हम बहुत बार असफ़ल होते हैं ।

हमें बार बार हर रोज ये याद दिलाया जाता है कि तुम ये नहीं कर सकते और धीरे धीरे हमारा बाल मन इसे सच मानने लगता है फिर बड़े होने पर जब हम कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो यही मन हमें बार बार रोक देता है और हम समझ नहीं पाते की हम क्यूँ बार बार रुक जाते हैं।

याद रखिये दोस्तो असफलता जीवन का एक हिस्सा है और लगातार प्रयास करने से ही सफलता मिलती है यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधे हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए |

आप हाथी नहीं इंसान है इसलिए जब तक जान है तब तक प्रयास करना मत छोड़िये |

किसी ने बहुत सही कहा है –
“गरीब पैदा होना गुनाह नहीं है लेकिन
गरीब ही मर जाना बहुत बड़ा गुनाह है ।”

By:- GARIMA DWIVEDI
 B.ED. 1st Sem
Uttaranchal College of Education (UCE)

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