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सामान्य वर्ग के गरीबों की सुध

सामान्य वर्ग के गरीबों की सुध

सामान्य वर्ग में भी लोग बहुत गरीब हैं, और उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। बहुत दिनों से यह मांग हो रही थी कि सामान्य वर्ग के लोग पिछड़ रहे हैं, उनको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा देश में जलवायु भी परिवर्तित हो रही है, उसका भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। सामान्य वर्ग के गरीबों को लंबे समय से आर्थिक पीड़ा भोगनी पड़ी है। पहले भी सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण देने के लिए आयोग बनाए गए थे, लेकिन आरक्षण की सीमा पचास फीसदी होने के कारण उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सका। नरसिंह राव सरकार ने 1991 में सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन उसे सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पचास फीसदी से ज्यादा आरक्षण की व्यवस्था नहीं हो सकती। उसके बाद सरकार ने 2004 में दोबारा आयोग बनाया। लेकिन उस आयोग के अध्यक्ष ने चार महीने बाद ही इस्तीफा दे दिया, जिसके कारण वह आयोग भंग हो गया। अभी सरकार ने आर्थिक आधार पर सामान्य वर्ग के लोगों को 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए जो संविधान संशोधन विधेयक पारित करवाया है, मेरी समझ से वह भले ही देर से ही उठाया गया कदम हो, लेकिन बिल्कुल दुरुस्त है।

जो लोग यह कह रहे हैं कि सरकार ने आरक्षण की अवधारणा को पलट दिया है, उन्हें यह समझना चाहिए कि सामान्य वर्ग में आने वाले गरीबों को आगे बढ़ाना गलत नहीं है। जिन लोगों को पहले से आरक्षण का लाभ हासिल है, उनमें भी कई क्रीमी लेयर आ गए हैं, जो पीढ़ी-दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। उनमें से क्रीमी लेयर को बाहर नहीं निकाला गया, उसके बाद यह कहा जा रहा है कि उनके लिए और आरक्षण की व्यवस्था की जाए। ऐसे में, सामान्य वर्ग के गरीबों को आगे बढ़ाने के लिए क्या सरकार को नहीं सोचना चाहिए? सामान्य वर्ग के लोगों के आर्थिक रूप से पिछड़ने के कई कारण हैं। जैसा कि हमने अपने अध्ययन में पाया कि पहाड़ी क्षेत्र, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित राज्य या इलाके, सीमा के आसपास के लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। जम्मू-कश्मीर में सीमा के आसपास के लोगों को कई तरह से नुकसान उठाना पड़ता है। नतीजतन वे आर्थिक रूप से पिछड़ रहे हैं। इनके लिए आरक्षण की व्यवस्था करना अब वास्तविक जरूरत है।

यहां इस बात का जिक्र करना लाजिमी लगता है कि हमने कैसे अध्ययन किया और सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की थी। हमने चार वर्षों के गहन अध्ययन के पश्चात 2010 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। सबसे पहले हमने इंटरनेट पर लोगों के सामने कुछ प्रश्न रखकर उनके जवाब मांगे। हमें देश भर के लोगों ने अपने जवाब भेजे, जिसका हमने अध्ययन किया। इस दौरान हमने केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ देश के सभी राज्यों का दौरा किया, वहां के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों, संबंधित मंत्रालय के मंत्रियों, स्वयंसेवी संगठनों और मीडिया के लोगों से बातचीत की। उसके बाद हमने अपनी रिपोर्ट तैयार की और उसे सरकार को सौंपा।

हमने सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी, उसमें कहा गया था कि इसे लागू करने के लिए सरकार को सांविधानिक, कानूनी और प्रशासनिक मॉडल टीम की जरूरत होगी। हमने राष्ट्र और राज्य, दोनों स्तरों पर एक कमीशन स्थापित करने की सिफारिश की थी, ताकि वह इसके लिए दिशा-निर्देश तैयार करे। सरकार को हमने सुझाव दिया था कि सरकार को इसे लागू करने के लिए पड़ताल करनी चाहिए। उसमें हमने चार टर्म ऑफ रेफरेंस सुझाए थे, जिसमें पहला था कि सामान्य वर्ग में कौन गरीब है, और वह क्यों गरीब है, उनकी पहचान कैसे की जाएगी, उसके मानदंड क्या होंगे और राज्य सरकार के साथ संपर्क करके कमीशन इस पर फैसला लेगा। उसमें यह भी कहा गया था कि राज्य सरकार सांविधानिक रूप से और सिद्धांततः उस पर सहमत होती है या नहीं और रोजगार एवं शिक्षा में आरक्षण की मात्रा कितनी होगी, यह बताएगी। इसके अलावा हमने यह भी कहा था कि सरकार को यह भी देखना चाहिए कि इन लोगों को शिक्षा और रोजगार मुहैया कराने के लिए कौन-कौन सी प्रमुख कल्याणकारी योजनाएं लाई जाएं। हो सकता है कि उन सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकार ने इसकी पड़ताल की भी हो, तभी इस पर फैसला लिया हो। लेकिन मेरा कहना है कि गरीब गरीब होता है। जाति-धर्म के आधार पर गरीबों के बीच भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए यह सही कदम है।

सरकार को आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के भौगोलिक फैलाव का अध्ययन करने और उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होगी। हमने जब राज्य सरकारों से आर्थिक आरक्षण पर विचार-विमर्श किया था, तब लगभग सभी राज्य इस पर सहमत थे। लेकिन जब हमने उनसे लिखित में अपना विचार पेश करने के लिए कहा, तो किसी ने भी लिखित में ऐसा नहीं दिया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि ऐसा करने पर उन पर राजनीतिक तौर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अभी संसद में जो संविधान संशोधन विधेयक पारित हुआ है, और जिस पर राष्ट्रपति के दस्तखत भी हो चुके हैं, उसमें कहा गया है कि आठ लाख रुपये की सीमा राज्य सरकारें अपने हिसाब से लागू करेंगी। इसकी मुख्य वजह है कि देश के कई राज्य ज्यादा विकसित हैं, तो कुछ राज्य अति निर्धन हैं। जब हमने अध्ययन किया था, तब नौ राज्यों की सत्तर फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे जी रही थी। इसलिए नए विधेयक में इसी आर्थिक असमानतओं को ध्यान में रखकर ऐसा प्रावधान किया गया है।

जहां तक इस नए कानून के कोर्ट में टिकने की बात है, तो इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। नरसिंह राव सरकार ने कानून बनाया था, उसे सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। मौजूदा सरकार ने अगर इसे फिर से आगे बढ़ाया है, तो उसने कुछ सोच-समझकर ही किया होगा। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अदालत में चुनौती मिलने पर सरकार अपना पक्ष कितनी मजबूती से रखती है। बहरहाल यह कहा जा सकता है कि सरकार ने देर से ही सही, सामान्य वर्ग के गरीब लोगों की सुध ली है।

By – Assistant Professor – अजय मोहन सेमवाल
Department –  B.Ed.
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