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लैंगिक समानता की दिशा में

लैंगिक समानता की दिशा में

||सर्वोच्च न्यायालय ने सेना में कार्यरत महिला अधिकारियों को उनके पुरुष समकक्षों की तरह स्थायी कमीशन और कमांड पोस्ट दिए जाने के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। अगर किसी अधिकारी को स्थायी कमीशन मिलता है, तो उसका मतलब यह है कि वह अधिकारी तब तक पद पर बना रहेगा, जब तक कि वह सेवानिवृत्त न हो जाए। असल में हमारी सेना में अधिकतर महिलाओं की भर्ती शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत होती है, जिनका कार्यकाल अधिकतम 14 साल का होता है। लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुना दिया है कि सभी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जाए, चाहे वह कितने भी समय से सेवा में हों, तो इसका मतलब है कि सेना में कार्यरत 1,653 महिला अधिकारियों का इसका फायदा मिलेगा और वे सेवानिवृत्ति की उम्र तक काम कर सकेंगी। कमांड पोस्ट का अर्थ है किसी सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करना। वास्तव में इस तरह का फैसला दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2010 में ही दिया था कि महिलाएं भी पुरुषों की तरह सेना में कमांड पोस्ट संभाल सकती हैं।

लेकिन केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा था कि महिलाओं को उनकी शारीरिक क्षमताओं और घरेलू दायित्वों की वजह से कमांड पोस्ट नहीं दी जा सकती, क्योंकि वे सैन्य सेवाओं की चुनौतियों और खतरों का सामना नहीं कर पाएंगी। इसके अलावा सरकारी पक्ष ने यह भी दलील दी कि गर्भावस्था की वजह से महिलाएं लंबे समय तक काम से दूर रहती हैं। उनके पास घरेलू जिम्मेदारियां होती हैं। इसके अलावा, उन्हें सीधी लड़ाई में इसलिए भी नहीं उतारा जा सकता, क्योंकि  यदि उन्हें युद्ध में बंदी बना लिया गया, तो यह उस अधिकारी, सेना और पूरी सरकार के लिए ठीक नहीं होगा। इसके साथ ही सरकारी पक्ष की यह भी दलील थी कि सेना में ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के पुरुष होते हैं, जो महिलाओं को अपना समकक्ष स्वीकार नहीं कर पाएंगे।

 केंद्र सरकार ने महिला सैन्य अधिकारियों को दस कमांड सपोर्ट सर्विस में कमांड पोस्ट देने पर आपत्ति जताई थी, जिसके खिलाफ उन महिला सैन्य अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उनकी दलील थी कि उन्हें स्थायी कमीशन वाला पोस्ट न देना प्रतिगामी कदम होगा और इससे उनकी गरिमा को अपूरणीय क्षति होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि यदि महिला सैन्य अधिकारियों की क्षमता और उपलब्धियों पर शक किया जाता है, तो यह महिला अधिकारी के साथ-साथ सेना का भी अपमान है। शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला अधिकारियों को 14 साल से अधिक की सेवा के लिए स्थायी कमीशन देने से इन्कार करना न्याय का मजाक है। उसने जारी निर्देशों को लागू करने के लिए तीन महीने का समय दिया है।

 भारतीय सेना में अब तक महिलाओं को कॉम्बैट भूमिका नहीं मिली है। आम तौर पर महिलाओं को आर्मी एजुकेशन कोर और न्यायाधीश महाधिवक्ता  के विभाग में ही स्थायी कमीशन दिया जाता है। उन्हें कॉम्बैट सपोर्ट सर्विसेज में कुछ हद तक कमांड की भूमिका मिली है, लेकिन स्वतंत्र रूप से नेतृत्व करने का मौका नहीं दिया गया है। लेकिन वायुसेना में महिलाएं लड़ाकू पायलट की भूमिका निभा रही हैं। ऐसा लगता है कि महिला अधिकारियों को कॉम्बैट भूमिका दिया जाना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि गर्भावस्था में महिला अधिकारियों को लंबे समय तक छुट्टी की जरूरत होगी। इसके अलावा, उन्हें लड़ाई के मोर्चे पर कमांडिंग पोजिशन में भेजना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने फ्लाइट कंट्रोलर मिंटी अग्रवाल का उदाहरण देते हुए कहा कि इस विंग कमांडर ने पाकिस्तान में बंधक बनाए गए विंग कमांडर को गाइड किया था। लेकिन कंप्यूटर पर बैठकर निर्देश देना अलग बात है और सीधे लड़ाई के मोर्चे पर उतरना बिल्कुल अलग। सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल ठीक कहा है कि महिलाओं की कमान में नियुक्त किए जाने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं होगा। लेकिन साथ ही उसने स्पष्ट किया कि युद्धक भूमिका में महिला अधिकारियों की तैनाती नीतिगत मामला है और इसके बारे में सक्षम प्राधिकारियों को विचार करना होगा।

 हालांकि दुनिया के कई देशों में महिलाएं कॉम्बैट पोस्ट संभाल रही हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में सैनिकों की कमी होने पर कई देशों ने महिलाओं को अपनी सेना में शामिल किया, लेकिन केवल तत्कालीन सोवियत संघ ने महिलाओं को युद्ध के मोर्चे पर भेजा। हालांकि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में महिलाओं को युद्ध में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई है। अमेरिका में महिलाओं को युद्ध में भेजने की इजाजत औपचारिक रूप से 2013 में दी गई, हालांकि इससे पहले भी जरूरत पड़ने पर महिला सैनिकों की टुकड़ियों को शामिल किया गया। वर्ष 2016 में ब्रिटेन ने भी महिलाओं को युद्ध में शामिल होने की इजाजत दे दी। अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा कनाडा, जर्मनी, पोलैंड, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, इस्राइल और उत्तर कोरिया में भी महिलाओं को युद्ध में शामिल होने की अनुमति मिली हुई है। इसके अलावा, कुछ ऐसे भी देश हैं, जिन्होंने अपनी उदारवादी सोच के कारण महिलाओं को युद्ध में लड़ने की इजाजत दी है। नाटो में शामिल स्लोवेनिया एकमात्र ऐसा देश है, जिसने देश के सेना प्रमुख के रूप में एक महिला को नियुक्त किया था। फ्रांस में भी महिलाएं पनडुब्बियों और दंगा नियंत्रण दल को छोड़कर सेना में सेवा दे सकती हैं।

 गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों को स्थायी सेवा प्रदान करने की घोषणा की थी, जिन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत चुना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि हमें मानसिकता बदलनी होगी। सेना में सच्ची समानता लानी होगी। सेना में महिला अधिकारियों की नियुक्ति एक विकासवादी प्रक्रिया है। सभी नागरिकों को अवसर की समानता, लैंगिक न्याय सेना में महिलाओं की भागीदारी का मार्गदर्शन करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की शारीरिक विशेषताओं पर केंद्र के विचारों को खारिज कर दिया है।

By – Assistant Professor – अजय मोहन सेमवाल 
Department -EDUCATION
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