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स्वच्छता, सरकार और सरोकार

स्वच्छता, सरकार और सरोकार

आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हों या आलोचक, आपको एक बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि उन्होंने ‘स्वच्छता’ जैसे विषय को विमर्श का एक बड़ा मुद्दा बना दिया है, वर्ना एक समय इसे उबाऊ और बोझिल माना जाता था। स्वच्छता को लेकर अब काफी गंभीरता नजर आती है और यह सरकारों की प्राथमिकता में है। हाल ही में भारत ने स्वच्छता पर एक वृहत सम्मेलन आयोजित किया।

गांधी जी की डेढ़ सौ वीं जयंती वर्ष के मौके पर बीते दो अक्तूबर को अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया गया, जिसमें मोदी ने कहा, ‘राजनीतिक नेतृत्व, सार्वजनिक कोष और लोगों की भागीदारी से दुनिया को पूर्ण रूप से स्वच्छ बनाने के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।’

प्रधानमंत्री ने कहा कि बनकर तैयार हो चुके 90 फीसदी शौचालयों का उपयोग किया जा रहा है और सरकार इस बात पर नजर रख रही है कि जिन शहरों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है, वहां के लोग अपनी पुरानी आदतों की ओर न लौटें। हालांकि स्वतंत्र आकलनों में स्वच्छता के मामले में तस्वीर इतनी उजली नजर नहीं आती।

स्वच्छ भारत अभियान के व्यापक प्रचार-प्रसार से निश्चित रूप से कुछ ठोस नतीजे हासिल हुए हैं, जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके साथ ही यह जानना भी अहम है कि सिर्फ बड़ी संख्या में शौचालयों का निर्माण करने भर से भारत स्वच्छ नहीं हो जाएगा। जिन शौचालयों का निर्माण हो रहा है, उनकी व्यापक रूप से देखरेख भी जरूरी है। शौचालयों के साथ पानी की निरंतर व्यवस्था जरूरी है, उसके बिना इनका उपयोग नहीं किया जा सकता। शौचालयों के आसपास व्याप्त गंदगी स्वच्छ भारत के लक्ष्य में बाधक है।

निश्चित रूप से भारत ने शौचालयों के निर्माण में भारी धन खर्च किया है, लेकिन उसकी तुलना में लोगों के व्यवहार में बदलाव और उनमें स्वच्छता के प्रति आग्रह पैदा करने के लिए कम निवेश किया गया है। सामान्य तौर पर स्वच्छता का संबंध लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने से भी है और यह अपने आप नहीं हो सकता।

इसके लिए जमीनी स्तर पर माहौल बनाने और लोगों को जागरूक करने की जरूरत है और ऐसे अभियानों में निरंतरता भी होनी चाहिए। आज भी किसी भी भारतीय शहर में कचरे के ढेर का दिख जाना अजूबा नहीं है। सिर्फ कचरा एकत्र करना ही जरूरी नहीं है, बल्कि इसे कचरे के पहाड़ का प्रबंधन कैसे हो यह देखना भी जरूरी है, क्योंकि इसका पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है।

देश की राजधानी दिल्ली तक में अभी यह व्यवस्था नहीं बन पाई है कि नगर निगम सूखे और गीले कचरे को अलग अलग एकत्र कर सके। कागज, प्लास्टिक बोतलें, कैन आदि सूखे कचरे को सब्जी और खाद्य सामग्री जैसे कार्बनिक कचरे को अलग किए बिना बड़े पैमाने पर कचरे की रिसाइक्लिंग नहीं की जा सकती। पूरे देश भर में नगर निकायों के 33 फीसदी वार्डों में ही कचरों को अलग करने की व्यवस्था है।

यह हाल गंदे पानी या नालियों में बहने वाली गंदगी का है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक हमारे शहरों में रोजाना 62 अरब लीटर अपशिष्ट जल पैदा होता है और इसमें से सिर्फ 23 अरब लीटर का ही प्रबंधन हो पाता है। बचा दो तिहाई अपशिष्ट जल बिना ट्रीटमेंट के नदियों में ऐसे ही बहा दिया जाता है। साफ पानी में ऐसी गंदगी मिलने से गंदे पानी का प्रबंधन बेमतलब रह जाता है।

हाल ही में एक रिपोर्ट में कचरा प्रबंधन के संबंध में गंभीर संकेतक सामने आए हैं। सारे राज्यों में महाराष्ट्र में सर्वाधिक गंदगी निकलती है, जिसमें से वह 63 फीसदी गंदगी का प्रबंधन करता है। केरल, पश्चिम बंगाल और बिहार उनके यहां पैदा होने वाली गंदगी में से सिर्फ दस फीसदी का ही ट्रीटमेंट कर पाते हैं। अलबत्ता देश के कुछ बड़े शहरों में कचरा प्रबंधन की स्थिति बेहतर है, लेकिन छोटे शहरों और कस्बों का बुरा हाल है।

लखनऊ पर जरा गौर कीजिए, वहां से आपको भारतीय शहरों की स्थिति का अंदाजा हो जाएगा। शहर का सिर्फ 55 फीसदी हिस्सा ही सीवर नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। जन शिकायतों में नालियों के ऊपर से बहती गंदगी और जलभराव आम है।

लोग नालियों की नियमित सफाई न होने की शिकायत करते हैं। घरों के सामने से बहने वाली नालियों को लोग अस्थायी तरीके से ढंक देते हैं या फिर उनके ऊपर प्लेटफार्म बना दिए गए हैं। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के अभी संयुक्त राजधानी हैदराबाद में रोजाना पैदा होने वाली गंदगी में सिर्फ पचास फीसदी का प्रबंधन हो पाता है और बाकी की गंदगी मूसी नदी में बहा दी जाती है।

आखिर लोगों को अपना व्यवहार बदलने के लिए कैसे तैयार किया जाए? मुझे इसकी एक शानदार मिसाल कर्नाटक के मैसूर शहर में नजर आई, जोकि देश के साफ सुथरे शहरों में से एक है। मैसूर में कचरे को अलग-अलग किया जाता है और फिर उसका ट्रीटमेंट किया जाता है। मुझे एक गैर सरकारी संगठन स्त्री शक्ति की एक कार्यकर्ता ने बताया कि आठ से दस वर्ष पहले शहर में अधिकांश निवासी सूखे और गीले कचरे को अलग करने के प्रति रुचि नहीं दिखाते थे।

गृहणियों को कहना होता था कि इससे उनका काम बढ़ जाएगा। लेकिन इस गैर सरकारी संगठन के कार्यकर्ताओं ने लोगों को समझाने का काम जारी रखा। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों से मुलाकात की और उन्हें पर्चे बांटे। उन्होंने वहां कुछ नियम बनाए और इनका पालन नहीं करने वालों पर जुर्माना लगाना शुरू कर दिया। इसके अच्छे नतीजे सामने आए और नतीजतन स्वच्छता के अपने प्रयासों के लिए मैसूर को अवार्ड भी मिला।

जाहिर है, बदलाव लाया जा सकता है, बशर्ते की बातें कम हों और काम अधिक।

By ASSISTANT PROFESSOR- Mr. Ajay Mohan Semwal
Department – Education
UCBMSH Magazine – (YouthRainBow)
UCBMSH WEBSITE – Uttaranchal (P.G.) College Of Bio-Medical Sciences & Hospital
UCBMSH B.ED WEBSITE – Uttaranchal College of Education
UCBMSH NURSING WEBSITE – College Of Nursing UCBMSH

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