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मातृभाषा हमें प्रकृति व परिवेश से जोड़ती है

मातृभाषा हमें प्रकृति व परिवेश से जोड़ती है

मानवीय समूहों में एक प्राकृतिक विकार होता है। उसे पराये समूह के सारे लोग एक जैसे लगते-दिखते हैं। मगर उनमें प्रत्यक्ष सम्मिलित होने पर पता चलता है कि हर व्यक्ति की अपनी अलग विशेषता है। परायी भाषा के साहित्य के साथ भी यही बात है। वैसे तो अनुवाद का एक सीमित क्षेत्र है, मगर भाषाओं के बड़े पैमाने पर मिलाप के अनेक क्षेत्र होते हैं। कुछ जगहों पर दूर-दूर की भाषाओं के लोग एक जगह आते हैं। उदाहरणार्थ मेले, धार्मिक समारोह, विस्थापन, अकाल के कारण होनेवाला विस्थापन वगैरह। इस बहाने कई भाषाओं के लोग एकत्र होते हैं, उनमें परस्पर परिचय बढ़ता है। एक दूसरे के प्रति गलतफहमियां कम होती हैं। बाद में भी संपर्क क्षेत्र निर्माण होते रहते हैं। साहित्यिक अनुवाद भी इन्हीं में से एक है।

दूसरा प्रकार है, प्रत्यक्ष निवास। ज्ञानार्जन के लिए फाहियान, ह्वेनत्सांग जैसे चीनी यायावर हमारे यहां नालंदा विश्वविद्यालय तक आए थे अथवा मार्को पोलो जैसे जिज्ञासु यायावर। हमारे तक्षशिला विश्वविद्यालय में यूनानी लोग बड़े पैमाने पर आते थे। तक्षशिक्षा आज के अफगानिस्तान में है, जो तब भारत का हिस्सा था। वहां पूर्वी यूरोप के लोगों का आना-जाना था। इससे परस्पर आदान-प्रदान बढ़ा। उनसे हमने काफी कुछ लिया-जैसे, काल-गणना पद्धति। उन्होंने भी हमसे काफी कुछ लिया- गणित, शल्यक्रिया वगैरह। इसके अलावा विवाह संबंध भी है। मराठवाड़ा के सातवाहन शासकों के राजघराने में उत्तर के मगध राजघराने के गुप्त राजाओं की लड़की ब्याही गई थी। बाद में वह रानी बनी और प्राकृत भाषाओं का बड़ा व्यवहार शुरू हुआ।

मराठे पानीपत के समय उत्तर भारत में गए थे। उस समय बड़ी संख्या में ये लोग वहां के निवासी बन गए। उन लोगों ने स्थानीय लोगों से संबंध बनाए। अब भी पंजाब-कश्मीर तक मराठे मिलते हैं। नए-नए क्रियोल (मिश्र भाषाएं) इसी से बनते हैं। हमारे यहां तुर्की, अफ्रीकी, सिद्धि, यहूदी, ईरानी लोग आकर हमेशा के लिए यहां के निवासी बन गए। हमारी दक्षिण की उर्दू उत्तर में पहुंची, जिसे आज भी दक्कनी ही कहते हैं। उदाहरणार्थ, ह्यां वो हुजुरे ज्जोनाज, व्हां वो हिजाबे-पासे-वजह। रास्ते में हम मिले कहां, बज्म में वो बुलाए क्यूं।। इसमें ह्यां, व्हां, क्यूं ये सारे शब्द इधर के हैं। ह्यां यानी यहां वो ऐसी घमंडी औरत, व्हां यानी वहां मुझ जैसा तंगहाल आदमी, वह मुझे रास्ते में कैसे मिलेगी और अपनी महफिल में क्यों बुलाएगी?

दरअसल, राष्ट्रभाषा ऐसे ही बनती है। जनभाषा के शब्द बड़े पैमाने पर राष्ट्रभाषा में आते हैं। उर्दू भी ऐसे ही बनी है। दुर्भाग्य से लिपि के कारण गड़बड़ हो गया। महात्मा गांधी ने बहुत प्रयास किए कि उसकी लिपि को बदलकर हिंदुस्तानी बनाया जाए। मगर दोनों तरफ के धार्मिक पागलपन के चलते यह संभव नहीं हुआ। लोग लिपि को त्यागने के लिए तैयार नहीं होते। खैर, इन बातों से द्विभाषिकता शुरू हो जाती है। द्विभाषिकता यानी दो भाषाओं का परस्पर गहरा असर। दूसरी भाषा से शब्द उधार लेते-लेते आप आगे बढ़ते हैं। सस्युर, चोम्स्की वगैरह सभी भाषाशास्त्री भाषा को अभिव्यक्ति के क्षेत्र की एक मानसिक आवश्यकता ही मानते हैं।

मगर भाषा जैविक निर्मिति ही है। जिस तरह पंछी के पंख उग आते हैं, उसी तरह मनुष्य की भाषा फूट पड़ती है। क्योंकि उसके बिना वह उड़ ही नहीं पाएगा, जी ही नहीं पाएगा। अपने बचपन के आरंभिक शब्दों पर गौर करें, तो वे हमारी मां से, परिवेश से नाता जोड़नेवाले होते हैं। एक-एक शब्द आत्मसात करते हुए हम बड़े होते हैं। प्रकृति से, परिवेश से जुड़ते चले जाते हैं। मातृभाषा यह काम करती है। इसी से हमारा शब्द-संग्रह बढ़ता जाता है। संदर्भ के अनुसार जैविक भाषा हमारी ग्रहणशीलता को नियंत्रित करती जाती है और हमारे संपूर्ण संवेदनाक्षेत्र पर भाषा का सार्वभौमत्व स्थापित हो जाता है।

हमें दिखाई देगा कि मनुष्य की जो खोपड़ी है, उसका आकार पांच करोड़ वर्षों में अन्य किसी भी प्राणी की तुलना में बढ़ता ही गया है। इसके कारण हमारे मस्तिष्क में केवल भाषा के ही दो बड़े केंद्र तैयार हुए हैं। उन केंद्रों से सामंजस्य बिठाना, संवेदनाओं का भाषा में रूपांतरण करना, नई वस्तु को नाम देना, दो भाषाओं के बीच अनुवाद प्रक्रिया करना-जैसे अनेकों केंद्र मस्तिष्क में काम करते हैं। कोई नई वस्तु दिख पड़ने पर हम डर जाते हैं, क्योंकि हमारी भाषा में उसके लिए कोई नाम नहीं होता। फिर एक केंद्र सूचित करता है कि यह तो कोई कीड़ा लगता है।

इस तरह हम उसे आत्मसात करते जाते हैं। आत्मसात करने की इस मानवीय प्रवृत्ति के कारण ही भाषा का विकास होता है। और केवल इंसान के ही पास यह क्षमता होती है। वैसे हर जानवर के पास उसकी अपनी थोड़ी-बहुत भाषा होती है, मगर प्रायः वह आंगिक होती है। इसके विपरीत मनुष्य ने संप्रेषण के लिए व्याकरण, शैली वगैरह का काफी विस्तार किया है। भाषा जैविक ही है, मगर हर बार मनुष्य का परिवेश बदल जाता है। पहाड़ों पर रहने वाले, समुद्र तट पर रहनेवाले लोगों के परिवेश अलग-अलग होंगे। इसलिए उनकी जरूरतें भी अलग-अलग होंगी।

इस तरह भौगोलिक स्थिति के अनुसार, परिस्थिति के अनुसार, आवश्यकता के अनुसार उसमें वैविध्य आता जाता है। लिंग, वचन, पुरुष इत्यादि व्याकरण भी बदल जाता है। भाषा जब व्यक्त होती है, तब मानसिकता का सवाल आता है। तुमने मुझे चाय नहीं दी-एक साधारण वाक्य है। मगर मानसिकता की दृष्टि से उसका इस्तेमाल करते हुए मैं विनम्रतापूर्वक कहूंगा, अरे, आपने मुझे चाय नहीं दी! अथवा गुस्सा होने पर कहूंगा, अरे, अभी तक तुमने मुझे चाय नहीं दी?

By -Asst. Professor – अजय मोहन सेमवाल
Department -EDUCATION
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